© 2026 Saurabh Dubey. All Rights Reserved.


आज फिर लिखने बैठा हूँ 

हाँ आज फिर लिखने बैठा हूँ,
हिम्मत की स्याही को कोशिशों की कलम में भर के,
ज़िंदगी की आँच पे अपने ख़्वाब पिघला के,
ज़िंदगी के संघर्षों की चिलचिलाती धूप में,
मैं आज फिर सीखने बैठा हूँ…
हाँ, आज फिर लिखने बैठा हूँ।

कुछ नज़्म लिखूँगा, कुछ कहानी लिखूँगा,
हर टूटे लम्हे की भी नई निशानी लिखूँगा,
जो जी रहा हूँ मैं उसकी रवानी लिखूँगा,
अपने इरादों की एक नई ज़ुबानी लिखूँगा।

मैं लिखूँगा हार को भी जीत की तैयारी में,
मैं लिखूँगा खुद को भी अपनी ज़िम्मेदारी में,
जो छूट गया था कल, उसे फिर से पाने का जुनून,
मैं लिखूँगा अपने कल को आज की दारी में।

मैं लिखूँगा उस धूप को जो राहें निखारती है,
मैं लिखूँगा उस आग को जो भीतर से पुकारती है,
मैं लिखूँगा उस नींद को जो मंज़िलों के ख़्वाब देखे,
मैं लिखूँगा उस वक़्त को जो तक़दीरें संवारती है।

मेरी ज़िंदगी की किताब मेरे नाम है,
इसकी हर कृति अब मैं ही लिखूँगा,
नई शुरुआत कर दी है मैंने—
अब इसकी इति भी मैं ही लिखूँगा।

मेरे जुनून ने थामा है मेरे ख़्वाबों का हाथ,
तो आज फिर मैं कुछ रचने बैठा हूँ…
हाँ, आज फिर लिखने बैठा हूँ।



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