शीर्षक: बात नई-नई


ये मैं हूँ या मुझमें है, ये जो बात है नई-नई,

मेरे मिज़ाज में उतरी, ये कायनात है नई-नई।


[रिहाई]

मैंने मलबे में दबे उस शख्स को आज़ाद कर दिया,

जिसने एक मुद्दत तक खुद को ही बर्बाद कर दिया।

सुबह की ठंडी हवाओं में अब एक पैगाम सा लगता है,

खुद को समेटना अब सबसे ज़रूरी काम सा लगता है।

खुद को तराशने की, ये बिसात है नई-नई।

ये मैं हूँ या मुझमें है, ये जो बात है नई-नई।

[शिनाख़्त]

बरसों बाद आँखों ने ख़ुद के लिए एक ख़्वाब देखा है,

अरसे बाद मैंने आज पहली बार खुद को बे-नकाब देखा है।

किसी के साथ का अब ज़हन में कोई शोर नहीं उठता,

अपनी ही सोहबत में रहता हूँ, अब मैं कमज़ोर नहीं दिखता। 

मेरे किरदार की अब ये, मरम्मत है नई-नई।

ये मैं हूँ या मुझमें है, ये जो बात है नई-नई।

[वजूद]

मंज़र से वो धुंध छँटी, तो नए नक़्श उभर आए,

भटके हुए पैरों को, अब जाके अपने निशान नज़र आए।

न किसी के आने की आहट है, न जाने का कोई डर है,

खुल गई हैं बंद आँखें, तो मिल गया मंज़िल का घर है।

मंज़िल की ओर बढ़ने की, मेरी ये शुरुआत है नई-नई।

ये मैं हूँ या मुझमें है, ये जो बात है नई-नई।

[तसल्ली]

वक़्त की इन सिलवटों को, सलीके से साफ़ कर दिया,

ख़ुद की हर एक ख़ता को, मैंने आज माफ़ कर दिया।

चमकती धूप अब चेहरे पर, किसी के साये को नहीं तकती,

अब मेरी शामें, पुराने बोझ का रास्ता देखते हुए नहीं थकतीं।

अपनी ही धुन में चलने की, 'नादाँ' ये आदत है नई-नई।

ये मैं हूँ या मुझमें है, 'सौरभ' ये बात है नई-नई,

'नादान क़लमकार' की, ये सौगात है नई-नई।



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